A page from my diary

darshan

Darshan Behl

रिश्तों पर कविता---------

 

indiainpencilदादी माँ बनाती थी रोटी,पहली गाय की आख़िरी कुते की,
एक बामणी दादी की,एक मेथरानी बाई की,
हर सुबह साँड़ आ जाता था,दरवाज़े पर गुड़ की डली के लिए,
कबूतर का चुगा,कीड़ियों को आटा,
एकादशी,अमावस् ,पूणिृमा का सीधा,
डाकौत का तेल,काली कुतिया के बयाने पर तेल-गुड़ का सीरा
सब कुछ निकल आता था,उस घर से
जिसमें विलासिता के नाम पर एक टेबल पंखा था,
अाज सामान से भरे घर में कुछ भी नहीं निकलता ,सिवाय लड़ने की करकश आवाज़ों के-------
मकान चाहे कच्चे थे,
लेकिन िरशते सारे सच्चे थे ,
चारपाई पर बैैठते थे,पास-पास रहते थे,
सोफ़े और डबल बेड आ गए,दूरियाँ हमारी बढ़ा गए,
छतों पर अब न सोते हैैं,बात-बतंगड़ अब न होते हैं,
आँगन में वृक्ष थे,साँझे सुख-दुख थे
दरवाज़ा खुला रहता था,राही भी आ बैठता था,zohra
कौवे भी कांव-कांव करते थे,
मेहमान आते जाते थे
इक साइकिल ही पास था,
फिर भी मेल-जोल था,रिश्ते निभाते थे ,
रूठते-मनाते थे,
पैसा चाहे कम था,माथे पे न ग़म था,
मकान चाहे कच्चे थे,रिश्ते सारे सच्चे थे,
अब शायद कुछ पा लिया है, पर लगता है बहुत कुछ गँवा दिया है

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One Reply to “A page from my diary”

  1. Shammi Budhiraja says:

    Ab whatts app se rishtey banate hain

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